नई दिल्ली: पिछले तीन महीनों से वैश्विक बाजारों को डरा रहा अमेरिका-ईरान सैन्य गतिरोध आखिरकार थम गया है। दोनों देशों के बीच हुए ऐतिहासिक शांति समझौते के बाद दुनिया की सबसे अहम तेल लाइफलाइन माने जाने वाले ‘होर्मुज स्ट्रेट’ (Strait of Hormuz) के दोबारा खुलने का रास्ता साफ हो गया है। इस बड़ी कूटनीतिक सफलता का असर चंद घंटों में अंतरराष्ट्रीय बाजार पर दिखा, जहाँ कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में 5 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई।युद्ध के कारण यह समुद्री रास्ता लगभग बंद हो गया था, जिससे दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हुई और कीमतें बेतहाशा बढ़ गई थीं। अब इस समझौते से भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं ने बड़ी राहत की सांस ली है।
- रास्ता खुलते ही समुद्र में बढ़ी हलचल, भारत का पहला कदम
शिप-ट्रैकिंग डेटा (केप्लर और एलएसईजी) के मुताबिक, शांति समझौते के एलान के बाद होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले शुरुआती जहाजों में भारत की पेट्रोनेट कंपनी का चार्टर्ड एलएनजी (LNG) टैंकर भी शामिल था। भारत सरकार की तरफ से भी इस आवाजाही की पुष्टि कर दी गई है।हालांकि, कई अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियां अभी भी पूरी सावधानी बरत रही हैं। उद्योग जगत इस मार्ग पर व्यावसायिक जहाजों का परिचालन पूरी तरह सामान्य करने से पहले सुरक्षा स्थिति और पानी में छिपी संभावित ‘माइन’ (समुद्री सुरंगों) के खतरों को लेकर साफ जानकारी चाहता है।
- $120 से गिरकर $83 पर आया क्रूड ऑयल
बीते 28 फरवरी को जब यह टकराव शुरू हुआ था, तब कच्चे तेल की कीमतें रिकॉर्ड रफ्तार से भागते हुए 120 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थीं। अब युद्धविराम की घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड गिरकर 83 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई (WTI) 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया है।
- संकट के दौरान भारतीय परिवारों पर पड़ा था दोहरा बोझ
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने के कारण भारत में ईंधन की कीमतें चार बार बढ़ानी पड़ी थीं, जिससे मालभाड़ा, हवाई यात्रा और रोजमर्रा के राशन का खर्च बढ़ गया था।
- टैक्स में कटौती: मार्च में सरकार ने घरेलू बाजार को झटके से बचाने के लिए पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी।
- दामों में इजाफा: हालांकि, बाद में तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल के दाम करीब 7.50 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ा दिए थे। इसके अलावा सीएनजी ₹6 प्रति किलो और एलपीजी सिलेंडर भी ₹89 तक महंगा हो गया था।
- बड़ा सवाल: क्या देश में तुरंत कम होंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के टूटने के बाद हर किसी के मन में यही सवाल है कि क्या पेट्रोल पंपों पर आज से ही दाम कम हो जाएंगे? आर्थिक जानकारों के अनुसार, तुरंत राहत मिलना थोड़ा मुश्किल है, जिसके पीछे कुछ तकनीकी कारण हैं:
- कंपनियों का पुराना घाटा: युद्ध के चरम पर होने के दौरान भारतीय तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने कच्चे तेल को ऊंचे दामों पर खरीदा था। कंपनियां पहले अपने उस घाटे की भरपाई करने की कोशिश करेंगी।
- गिरावट के टिकने का इंतजार: तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई इस तत्कालिक गिरावट को कम से कम कुछ हफ्तों तक मॉनिटर करेंगी।
- राहत की उम्मीद: यदि ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक $80-$84 के दायरे में बना रहता है, तो आने वाले कुछ महीनों में तेल कंपनियां आम जनता को ₹2 से ₹5 प्रति लीटर की क्रमिक (धीरे-धीरे) राहत दे सकती हैं।
- ईंधन के अलावा भारत को मिलने वाले 4 बड़े फायदे
कीमतों में तुरंत बड़ी कटौती न भी हो, तो भी होर्मुज मार्ग के बहाल होने से भारतीय बाजार को कई मोर्चों पर सीधी राहत मिलेगी:
- सप्लाई चैन होगी सामान्य: युद्ध के दौरान एलपीजी और एलएनजी की बाधित हुई सप्लाई अब नियमित होगी, जिससे गैस किल्लत या कटौती का खतरा टल जाएगा।
- महंगाई पर लगेगा ब्रेक: ट्रांसपोर्टेशन की लागत घटने से फल, सब्जियां, रसोई के राशन और निर्माण सामग्री की कीमतों में चल रही बेतहाशा बढ़ोतरी पर रोक लगेगी।
- मजबूत होगा रुपया: भारत का आयात बिल (Import Bill) कम होने से देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव घटेगा, जिससे डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हो रहा भारतीय रुपया संभलेगा।
- इन उद्योगों को मिलेगी नई जान: विमानन (Aviation), फर्टिलाइजर (खाद), पेट्रोकेमिकल्स और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टर्स की इनपुट कॉस्ट काफी कम हो जाएगी, जिससे उनके मुनाफे में सुधार होगा।
भारत की रणनीतिक तैयारी आई काम: इस पूरे संकट के दौरान भारत की कूटनीति और रणनीति बेहद मजबूत रही। भारत ने केवल खाड़ी देशों पर निर्भर रहने के बजाय रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से तेल की खरीद बढ़ा दी थी। सरकार के निर्देश पर पेट्रोलियम मंत्रालय लगातार ईंधन के बफर स्टॉक का बुलेटिन जारी करता रहा, जिससे देश के भीतर कभी भी पैनिक या किल्लत जैसे हालात पैदा नहीं हुए। यही वजह है कि अन्य देशों के मुकाबले भारत पर इसका असर काफी कम पड़ा।

