Sunday, June 21, 2026

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बिहार चुनाव में दलों को मिला 281 करोड़ का चंदा, प्रचार पर सबसे ज्यादा खर्च; ADR रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

पटना: बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों को मिले चंदे और उनके खर्च को लेकर एक बड़ा खुलासा सामने आया है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव में हिस्सा लेने वाली 10 प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने कुल 281.32 करोड़ रुपये का चंदा जुटाया, जबकि उनका घोषित चुनावी खर्च 193.47 करोड़ रुपये रह।

10 पार्टियों ने जुटाए 281 करोड़ रुपये

रिपोर्ट के मुताबिक, पांच राष्ट्रीय और पांच क्षेत्रीय दलों ने मिलकर चुनाव के दौरान 281.323 करोड़ रुपये का फंड जुटाया। हालांकि, इन दलों ने कुल 193.466 करोड़ रुपये खर्च होने की जानकारी दी है। इस तरह चंदे और खर्च के बीच करीब 88 करोड़ रुपये का अंतर सामने आया है।

  • किन दलों को किया गया शामिल?

ADR ने अपनी रिपोर्ट में भाजपा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बसपा और माकपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के साथ-साथ राजद, जदयू, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), एआईएमआईएम और भाकपा जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के चुनावी खर्च और आय का विश्लेषण किया है।

  • प्रचार पर हुआ सबसे ज्यादा खर्च

रिपोर्ट के अनुसार, चुनावी प्रचार खर्च का सबसे बड़ा मद बनकर उभरा। राजनीतिक दलों ने प्रचार और जनसंपर्क गतिविधियों पर 100.429 करोड़ रुपये खर्च किए, जो कुल खर्च का 36.68 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट होता है कि मतदाताओं तक पहुंच बनाने के लिए दलों ने प्रचार अभियानों पर सबसे अधिक जोर दिया।

  • यात्रा और उम्मीदवारों पर भी खर्च हुए करोड़ों

प्रचार के अलावा राजनीतिक दलों ने यात्रा पर 79.539 करोड़ रुपये खर्च किए। वहीं उम्मीदवारों को एकमुश्त भुगतान के रूप में 62.072 करोड़ रुपये दिए गए। यह राशि चुनावी प्रबंधन और संगठनात्मक गतिविधियों में इस्तेमाल की गई।

  • चंदे और खर्च के अंतर पर उठे सवाल

रिपोर्ट में सामने आए लगभग 88 करोड़ रुपये के अंतर ने चुनावी वित्तीय पारदर्शिता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक दलों को अपनी आय और खर्च का अधिक स्पष्ट और विस्तृत विवरण सार्वजनिक करना चाहिए।

  • चुनावी फंडिंग पर बढ़ी बहस

ADR की यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब चुनावी चंदे और राजनीतिक फंडिंग की पारदर्शिता को लेकर देशभर में चर्चा जारी है। रिपोर्ट ने एक बार फिर राजनीतिक दलों की वित्तीय जवाबदेही और चुनावी खर्च के खुलासे को लेकर बहस तेज कर दी है।

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