नई दिल्ली/गुवाहाटी: प्रसिद्ध लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता आकार पटेल के हालिया विश्लेषण ने भारत के बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य, विशेषकर ‘गुजरात मॉडल’ और ‘न्यू इंडिया’ (नया भारत) की अवधारणाओं पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। उनके अनुसार, देश में हाल के वर्षों में आए नीतिगत बदलाव और नए सरकारी नियम यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि आधुनिकीकरण के दावों के बीच भारत असल में किस दिशा में आगे बढ़ रहा है।लेखक ने असम और गुजरात के हालिया प्रशासनिक फैसलों का हवाला देते हुए यह सवाल उठाया है कि क्या लोकतांत्रिक मूल्यों वाले देश में अल्पसंख्यकों को लक्षित कर भौगोलिक और सामाजिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश की जा रही है?
- असम के नए भूमि नियम और गुजरात का ‘डिस्टर्ब्ड एरियाज़ एक्ट’
आकार पटेल ने अपने विश्लेषण की शुरुआत असम भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा जारी एक आधिकारिक नोट से की। पिछले वर्ष अगस्त में आए इन नए नियमों के अनुसार, असम में दो अलग-अलग धर्मों के व्यक्तियों के बीच ज़मीन की खरीद-बिक्री के लिए एक बेहद जटिल प्रक्रिया तय की गई है।
- इसके तहत आवेदन को पहले सर्कल ऑफिसर, फिर डिप्टी कमिश्नर और अंततः राज्य सरकार के राजस्व विभाग तथा असम पुलिस की स्पेशल ब्रांच की जांच से गुजरना पड़ता है। आखिरी फैसला डिस्ट्रिक्ट कमिश्नर के विवेक पर निर्भर करता है।
- लेखक का मानना है कि इस प्रकार के सख्त कानूनों का मुख्य स्रोत गुजरात का ‘डिस्टर्ब्ड एरियाज़ एक्ट’ (अशांत क्षेत्र कानून) है। मूल रूप से सांप्रदायिक हिंसा के दौरान अल्पसंख्यकों की संपत्ति की सुरक्षा के लिए बने इस कानून का इस्तेमाल, अब कथित तौर पर मुस्लिम आबादी को मिश्रित या बहुसंख्यक आबादी वाले इलाकों से दूर रखने के लिए किया जा रहा है
- ‘गेटो’ और ‘अपार्थाइड’ (रंगभेद) से तुलना
लेख में इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है कि जहाँ अमेरिका जैसे देशों ने नस्लीय अलगाव को खत्म करने के लिए ‘फेयर हाउसिंग एक्ट’ जैसे प्रगतिशील कानून बनाए, वहीं भारत के कुछ राज्यों में इसके विपरीत रुझान देखने को मिल रहा है। आकार पटेल लिखते हैं:
गुजरात में साल 2009 और 2019 में इस कानून में किए गए संशोधनों ने जिला कलेक्टरों को व्यापक अधिकार दे दिए हैं। अब यदि प्रशासन को लगता है कि किसी संपत्ति के ट्रांसफर से ‘जनसांख्यिकीय संतुलन’ (Demographic Balance) बिगड़ सकता है या ‘ध्रुवीकरण’ की संभावना है, तो वे आपसी सहमति से होने वाली खरीद-बिक्री को भी रद्द कर सकते हैं। बिना अनुमति संपत्ति हस्तांतरण पर सजा को भी 6 महीने से बढ़ाकर 6 साल कर दिया गया है।
- ‘न्यू इंडिया’ का वास्तविक ढांचा क्या है?
विश्लेषण के अनुसार, ‘गुजरात मॉडल’ और ‘न्यू इंडिया’ जैसे शब्दों की कोई स्पष्ट आधिकारिक परिभाषा नहीं है, लेकिन सरकार के नीतिगत कदमों और नए कानूनों को देखकर इसके अंतर्निहित ढांचे को समझा जा सकता है। लेख में हाल के वर्षों में आए कई कानूनों का क्रमवार उल्लेख किया गया है:
- 2015: महाराष्ट्र और हरियाणा में बीफ प्रतिबंध से जुड़े कड़े कानून।
- 2018: उत्तराखंड से शुरू हुए अंतरधार्मिक विवाहों (Interfaith Marriages) पर अंकुश लगाने वाले कानून।
- 2019: मुस्लिम तलाक (तीन तलाक) को अपराध की श्रेणी में लाना और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का कार्यान्वयन।
- एक आत्मनिरीक्षण का सवाल
आकार पटेल ने देश के नागरिकों और बुद्धिजीवियों के सामने एक यक्ष प्रश्न रखा है। उनका कहना है कि सरकार के इन सभी कदमों का गहराई से मूल्यांकन करने के बाद हमें खुद से यह पूछना होगा: “क्या हम (एक समाज के तौर पर) इन्हीं सब नीतियों की हिमायत करते हैं और क्या हम चाहते हैं कि वैश्विक मंच पर भारत की पहचान इसी रूप में हो?”बदलते भारत की इस कानूनी और सामाजिक तस्वीर ने देश के नीति-निर्माताओं, न्यायपालिका और आम नागरिकों के सामने आत्मनिरीक्षण की एक नई खिड़की खोल दी है।

