‘चूल्हा-चौका’ नहीं, देश की बुनियाद हैं महिलाएं; सुप्रीम कोर्ट ने समाज को दिखाया आईना!
- अदृश्य नींव हैं गृहिणियां:सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने बेहद भावुक और तार्किक टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत में करोड़ों महिलाएं रोज़ाना बिना किसी छुट्टी के घर संभालती हैं, बच्चों की परवरिश करती हैं और बुजुर्गों की सेवा करती हैं। वे समाज की ‘अदृश्य नींव’ (Invisible Foundation) हैं।
- बाजार से खरीदेंगे तो छूट जाएंगे पसीने:अदालत ने साफ किया कि एक गृहिणी सुबह से रात तक जो काम करती है (जैसे खाना बनाना, सफाई, प्रबंधन, ट्यूशन), अगर आज के समय में इन सेवाओं को बाजार से खरीदा जाए, तो इसकी लागत किसी भी मध्यमवर्गीय परिवार के बजट से बाहर होगी।
- अपनों के लिए कुर्बान करती हैं महत्वाकांक्षाएं:जज साहब ने कहा कि घर की महिलाएं अक्सर अपने परिवार की खुशी के लिए अपनी इच्छाओं और करियर को दरकिनार कर देती हैं। वे प्रत्यक्ष रूप से भले पैसा कमाती न दिखें, लेकिन उनके इसी त्याग के कारण परिवार के पुरुष या अन्य सदस्य बाहर जाकर निश्चिंत होकर रोजगार या बिजनेस कर पाते हैं।
अब ‘न्यूनतम मजदूरी’ से नहीं, ₹30,000 प्रति महीने के मानक से तय होगा गृहिणियों का मुआवजा!
- ऐतिहासिक कानूनी बदलाव:अब तक मोटर दुर्घटना मामलों में अगर किसी गृहिणी की मौत होती थी, तो बीमा कंपनियां और अदालतें उन्हें ‘अकुशल श्रमिक’ मानकर बहुत कम मुआवजा देती थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस रूढ़िवादी सोच को खारिज कर दिया है।
- तय हुआ नया पैमाना:सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अब से गृहिणियों द्वारा परिवार को दी जाने वाली सेवाओं के नुकसान को मुआवजे की गणना में एक अलग मद (Separate Head) के रूप में जोड़ा जाएगा। कोर्ट ने इसके लिए न्यूनतम 30,000 रुपये प्रतिमाह का एक मानक पैमाना तय कर दिया है, जिससे भविष्य में मुआवजे की राशि कई गुना बढ़ जाएगी।
क्या सुधरेगी पुरुषों की मानसिकता? पारिवारिक संपत्ति और विवादों में भी दिखेगा इस फैसले का असर।
- पारिवारिक विवादों और भरण-पोषण (Maintenance) के मामलों में भी महिलाओं के घरेलू श्रम को एक बड़ी ताकत के रूप में देखा जाएगा।
- वैवाहिक और संपत्ति विवादों में भी अदालतें अब महिलाओं के योगदान का मूल्यांकन इस नए नजरिए से करेंगी।

