Tuesday, July 14, 2026

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तमिलनाडु में गोवंश वध पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, मद्रास हाई कोर्ट के आदेश पर लगाई स्टे

नई दिल्ली/चेन्नई। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में गोवंश वध को लेकर मद्रास हाई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के 27 मई के फैसले पर स्टे जारी किया और मामले में नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश के अमल पर रोक लगा दी, जिसमें तमिलनाडु सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था कि बकरीद सहित किसी भी दिन राज्य में किसी भी गाय या बछड़े का वध न हो।

क्या था मद्रास हाई कोर्ट का आदेश?

27 मई को मद्रास हाई कोर्ट ने मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया था कि वे यह सुनिश्चित करें कि बकरीद के अवसर पर या किसी अन्य दिन तमिलनाडु में कहीं भी गाय या बछड़े का वध न किया जाए। अदालत ने यह भी कहा था कि पशुओं का वध केवल अधिकृत बूचड़खानों में ही किया जा सकता है और तय स्थानों के बाहर किसी भी तरह के वध की अनुमति नहीं दी जा सकती।

तमिलनाडु सरकार ने क्यों दी चुनौती?

तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में कहा कि हाई कोर्ट का आदेश मूल जनहित याचिका (PIL) की मांग से कहीं आगे बढ़ गया। सरकार के अनुसार, याचिकाकर्ता ने केवल यह अनुरोध किया था कि बकरीद के दौरान सार्वजनिक स्थानों पर या अधिकृत बूचड़खानों के बाहर पशु वध न हो और मौजूदा कानूनों का पालन सुनिश्चित किया जाए।

राज्य सरकार ने यह भी कहा कि अधिकारियों ने हाई कोर्ट को पहले ही बता दिया था कि कानून के पालन के लिए आवश्यक सभी व्यवस्थाएं की गई हैं। इसके बावजूद अदालत ने पूरे राज्य में गाय और बछड़ों के वध पर प्रभावी प्रतिबंध लगाने जैसा आदेश दे दिया।

राज्य सरकार का कानूनी तर्क

याचिका में तमिलनाडु सरकार ने कहा कि तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 पशु वध को नियंत्रित करता है और यह निर्धारित करता है कि किन परिस्थितियों में वध की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि, यह कानून राज्य में गोवंश वध पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता।सरकार का कहना है कि हाई कोर्ट का आदेश मौजूदा कानूनी ढांचे से आगे जाकर ऐसा निर्देश देता है, जिसकी मूल याचिका में मांग भी नहीं की गई थी।

फिलहाल क्या स्थिति है?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा मद्रास हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाए जाने के बाद फिलहाल राज्य में वही कानूनी व्यवस्था प्रभावी रहेगी, जो तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 के तहत लागू है। मामले की अगली सुनवाई में शीर्ष अदालत तमिलनाडु सरकार और अन्य पक्षों की दलीलों पर विचार करेगी।

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