नई दिल्ली/वृंदावन: एक दौर था जब वृंदावन का नाम ज़हन में आते ही संकरी गलियां, यमुना का शांत किनारा, भजनों की गूंज और ठाकुर बांके बिहारी की छवि उभरती थी। देश-दुनिया से लोग यहां भागदौड़ से दूर शांति, वैराग्य और भक्ति की तलाश में आते थे। लेकिन पिछले चार-पांच सालों में वृंदावन की यह पारंपरिक और आध्यात्मिक तस्वीर तेज़ी से बदली है। आज इस शहर में सिर्फ मंदिरों और आश्रमों की आध्यात्मिक चर्चा नहीं होती, बल्कि चर्चा के केंद्र में लग्जरी टाउनशिप, सर्विस अपार्टमेंट्स, कमर्शियल प्लॉट्स और बड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स आ चुके हैं।
आलम यह है कि वृंदावन में जमीनों और फ्लैट्स की कीमतें अब देश के बड़े मेट्रो शहरों को टक्कर दे रही हैं। लेकिन इस बेतहाशा उछाल ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है— क्या इस पौराणिक और प्राचीन शहर का बुनियादी ढांचा इस अनियंत्रित भीड़ और कंक्रीट के बोझ को संभालने के लिए तैयार है?
भक्ति का केंद्र या बड़ा इन्वेस्टमेंट हब?
आजतक रेडियो के शो ‘प्रॉपर्टी से फायदा’ में बातचीत करते हुए रियल एस्टेट एक्सपर्ट संजीव राठौड़ ने वृंदावन के बाज़ार की इस बदलती मानसिकता का विश्लेषण किया। उनके अनुसार, वृंदावन में प्रॉपर्टी खरीदने वालों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
- श्रद्धालु वर्ग (80% से 90%): यह वह आबादी है जिनकी भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के प्रति अटूट श्रद्धा है। कोविड-19 महामारी के बाद देश में आध्यात्मिक झुकाव तेज़ी से बढ़ा है, जिसने लोगों को यहाँ ‘सेकंड होम’ बनाने के लिए प्रेरित किया है ताकि वे जीवन का कुछ समय शांति से गुजार सकें।
- विशुद्ध निवेशक वर्ग: वृंदावन में लगातार बढ़ती डिमांड और भारी रिटर्न (ROI) को देखकर अब एक बहुत बड़ा विशुद्ध निवेशक वर्ग भी सक्रिय हो गया है। लोग इस डर (FOMO – Fear of Missing Out) से भी निवेश कर रहे हैं कि कहीं यह मौका उनके हाथ से हमेशा के लिए निकल न जाए।
सोशल मीडिया और सेलिब्रिटी इफेक्ट का असर
पहले वृंदावन को मुख्य रूप से एक अर्ध-ग्रामीण या पारंपरिक तीर्थस्थल माना जाता था, जहां इंफ्रास्ट्रक्चर सीमित था। लेकिन हाल के वर्षों में सोशल मीडिया रील्स, कथावाचकों की बढ़ती लोकप्रियता और विराट कोहली-अनुष्का शर्मा जैसी बड़ी हस्तियों (सेलिब्रिटीज) के आगमन ने युवाओं और आधुनिक परिवारों के बीच वृंदावन का क्रेज अचानक बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है।
इसके साथ ही जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट, यमुना एक्सप्रेसवे से बेहतरीन कनेक्टिविटी और ‘बांके बिहारी कॉरिडोर’ जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स ने इस शहर को रियल एस्टेट के नक्शे पर चमका दिया है।
क्या दिल्ली-नोएडा जैसी भीड़ झेल पाएगा वृंदावन?
आमतौर पर नोएडा, ग्रेटर नोएडा या चंडीगढ़ जैसे आधुनिक शहरों को एक तय मास्टर प्लान के तहत बसाया जाता है, जहां चौड़ी सड़कें, सीवरेज सिस्टम और पानी की सप्लाई आबादी के हिसाब से पहले से तय होती है। इसके विपरीत, वृंदावन एक प्राचीन और ऐतिहासिक शहर है।
जिस रफ्तार से यहां गगनचुंबी सोसाइटियां और कमर्शियल हब बन रहे हैं, उससे शहर के ड्रेनेज सिस्टम, ट्रैफिक, बिजली और सबसे बढ़कर ‘जल संकट’ पर भारी दबाव आने की आशंका है। भारत पहले से ही पानी की कमी से जूझ रहा है (जहां आबादी 18% है और पानी सिर्फ 4%), ऐसे में वृंदावन में अनियंत्रित कंस्ट्रक्शन इस संकट को और गहरा कर सकता है।
सरकार के सामने मूल स्वरूप बचाने की चुनौती
संजीव राठौड़ के मुताबिक, वृंदावन का रियल एस्टेट मार्केट इस समय अपने चरम पर है। उत्तर प्रदेश सरकार भी इस बात को मान चुकी है कि यदि अब कड़े और ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वृंदावन का मूल आध्यात्मिक स्वरूप हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगा। मुख्यमंत्री खुद दर्जनों बार यहां का दौरा कर चुके हैं और ‘मथुरा-वृंदावन मास्टर प्लान 2031’ के जरिए विकास को नियंत्रित करने की कोशिशें की जा रही हैं।


