Sunday, July 12, 2026

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अखिलेश यादव का बदला अंदाज ‘सनातन’ से सवर्ण साधने की तैयारी या 2027 का बड़ा चुनावी दांव

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव का बदला हुआ राजनीतिक अंदाज चर्चा का विषय बना हुआ है। कभी भाजपा पर हिंदुत्व की राजनीति को लेकर हमलावर रहने वाली सपा अब धार्मिक और सामाजिक प्रतीकों के जरिए नए वोट बैंक तक पहुंच बनाने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। यही वजह है कि हाल के दिनों में अखिलेश यादव के कई कदमों ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।
हाल ही में लखनऊ स्थित सपा कार्यालय के बाहर “सनातन ही समाजवाद है” लिखा पोस्टर लगाया गया, जिसने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसके अलावा अखिलेश यादव ने राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मुद्दे पर भगवान राम के श्रद्धालुओं की भावनाओं का जिक्र किया और ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से मुलाकात कर उनका आशीर्वाद भी लिया। सपा की ओर से ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित किया गया है और आने वाले समय में ऐसे कई कार्यक्रमों की तैयारी भी बताई जा रही है।

सवर्ण वोट बैंक पर नजर

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि समाजवादी पार्टी इस बार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य समुदाय को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। उत्तर प्रदेश में इन वर्गों का प्रभाव कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक माना जाता है। खासकर अवध और पूर्वांचल के क्षेत्रों में इन समुदायों का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव काफी मजबूत है।

हाल के महीनों में सपा नेताओं के कुछ विवादित बयानों ने सवर्ण समाज में नाराजगी पैदा की थी। पार्टी प्रवक्ता राजकुमार भाटी के बयान और सांसद रामजीलाल सुमन की महाराणा सांगा पर की गई टिप्पणी को लेकर विपक्ष ने सपा को घेरा। माना जा रहा है कि इन्हीं विवादों के बाद पार्टी ने अपनी छवि सुधारने और सवर्ण समाज के बीच सकारात्मक संदेश देने की कोशिश तेज कर दी है।

क्या दोहराई जा रही है 2022 वाली रणनीति?

यह पहली बार नहीं है जब सपा सवर्ण मतदाताओं को साधने का प्रयास कर रही है। 2022 विधानसभा चुनाव से पहले भी अखिलेश यादव ने भगवान परशुराम की प्रतिमा का अनावरण किया था और ब्राह्मण समाज को जोड़ने के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए थे। हालांकि चुनावी नतीजों में इसका बड़ा फायदा देखने को नहीं मिला। चुनावी अध्ययनों के अनुसार, उस समय ब्राह्मण मतदाताओं का बड़ा वर्ग भाजपा के साथ बना रहा।

सपा के सामने चुनौती भी कम नहीं

विश्लेषकों का कहना है कि सवर्ण वोटों को आकर्षित करने की कोशिश सपा के लिए अवसर भी है और चुनौती भी। यदि पार्टी इस वर्ग में अपेक्षित समर्थन हासिल नहीं कर पाती, तो उसके पारंपरिक PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) वोट बैंक पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे में अखिलेश यादव को सामाजिक संतुलन बनाए रखते हुए अपनी नई रणनीति को सफल बनाना होगा।

2027 की तैयारी शुरू

फिलहाल साफ है कि समाजवादी पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए अपनी राजनीतिक रणनीति को नया स्वरूप दे रही है। धार्मिक प्रतीकों, सामाजिक समीकरणों और सवर्ण समाज तक पहुंच बनाने की कोशिशों के जरिए पार्टी अपने वोट आधार का विस्तार करना चाहती है। हालांकि यह रणनीति चुनावी मैदान में कितनी कारगर साबित होगी, इसका जवाब आने वाले समय और चुनावी नतीजे ही देंगे।

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