नई दिल्ली: भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम सप्लाई को लेकर लंबे समय से चल रही बातचीत अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आगामी ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच यूरेनियम आपूर्ति से जुड़े महत्वपूर्ण समझौते पर प्रगति होने की उम्मीद जताई जा रही है। यदि यह डील होती है, तो यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा और परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हो सकती है।
भारत और ऑस्ट्रेलिया ने वर्ष 2014 में नागरिक परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद से यूरेनियम की व्यावसायिक आपूर्ति को लेकर दोनों देशों के बीच लगातार बातचीत चल रही है। विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, हाल के वर्षों में इस विषय पर सकारात्मक चर्चा हुई है और दोनों पक्ष समाधान की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह समझौता?
भारत ने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए देश में बिजली की मांग तेजी से बढ़ने की संभावना है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और औद्योगिक विकास जैसे क्षेत्रों को लगातार और स्वच्छ ऊर्जा की आवश्यकता होगी। ऐसे में परमाणु ऊर्जा एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में उभर रही है।
सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में देश की परमाणु ऊर्जा क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि करना है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर यूरेनियम की उपलब्धता आवश्यक होगी।
ऑस्ट्रेलिया क्यों है भारत की पहली पसंद?
ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार वाले देशों में शामिल है। वहीं भारत में उपलब्ध यूरेनियम अयस्क अपेक्षाकृत कम गुणवत्ता का है और उसका खनन महंगा पड़ता है। यही कारण है कि भारत अपनी कुल यूरेनियम आवश्यकता का लगभग 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा कनाडा, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और रूस जैसे देशों से आयात करता है।
यदि ऑस्ट्रेलिया से नियमित यूरेनियम आपूर्ति शुरू होती है, तो भारत को ऊर्जा स्रोतों में विविधता मिलेगी और आयात पर निर्भरता अधिक संतुलित होगी।
2047 तक बढ़ेगी यूरेनियम की मांग
वर्तमान में भारत को हर वर्ष लगभग 1,500 से 2,000 टन यूरेनियम की आवश्यकता होती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य को हासिल करने के लिए यह मांग बढ़कर करीब 5,400 टन प्रतिवर्ष हो सकती है।
भारत को क्या होगा फायदा?
- परमाणु ऊर्जा उत्पादन को मिलेगा बढ़ावा।
- बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने में मिलेगी मदद।
- AI और डेटा सेंटर जैसे उभरते क्षेत्रों को मिलेगी स्थिर ऊर्जा।
- ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और आयात के स्रोतों में विविधता आएगी।
- स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्य को हासिल करने में मिलेगी गति।


