Saturday, July 11, 2026

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खामेनेई के अंतिम संस्कार पर सियासत नहीं होनी चाहिए: शशि थरूर बोले- यह दुनिया भर में अपनाई जाने वाली सामान्य कूटनीतिक परंपरा

नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट

ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारत के प्रतिनिधिमंडल की भागीदारी को लेकर देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। हालांकि, इस पूरे विवाद के बीच कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इसे लेकर संतुलित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी भी देश के शीर्ष नेता के निधन पर श्रद्धांजलि देने के लिए प्रतिनिधिमंडल भेजना एक सामान्य अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक परंपरा है और इसे राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए।

मीडिया से बातचीत में शशि थरूर ने कहा कि जब किसी ऐसे नेता का निधन होता है, जिसने अपने देश में सर्वोच्च आध्यात्मिक और राजनीतिक भूमिका निभाई हो, तो दुनिया के कई देश सम्मान प्रकट करने के लिए अपने प्रतिनिधि भेजते हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक कूटनीति का स्थापित हिस्सा है।

थरूर ने कहा कि कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद सहित कई भारतीय प्रतिनिधि अंतिम संस्कार समारोह में शामिल हो रहे हैं। उनके अनुसार, ऐसे अवसरों पर राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर दिवंगत नेताओं के प्रति सम्मान व्यक्त करना ही उचित परंपरा है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भारत ने भी अतीत में कई विश्व नेताओं के अंतिम संस्कार में उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजे हैं। इसी तरह, जब भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का निधन हुआ था, तब दुनिया के अनेक देशों के शीर्ष नेता भारत आए थे। इसी प्रकार मदर टेरेसा के अंतिम संस्कार में भी कई देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। थरूर ने कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों और कूटनीतिक शिष्टाचार का सामान्य हिस्सा है।

इस बीच भारत सरकार ने भी ईरान के अंतिम संस्कार समारोह में आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया है। भारत की ओर से विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा तथा सैयद अता हसनैन (बिहार के राज्यपाल) भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। इसके अलावा कई राजनीतिक नेताओं और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों को भी ईरान की ओर से आमंत्रित किया गया है।

रिपोर्टों के अनुसार, अंतिम संस्कार समारोह 4 से 9 जुलाई तक तेहरान, क़ोम और मशहद में आयोजित किए जाएंगे। इसमें दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधियों और नेताओं के शामिल होने की संभावना है।

भारत के प्रतिनिधिमंडल को लेकर कुछ राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं कि क्या यह भारत की पश्चिम एशिया नीति में किसी बदलाव का संकेत है। हालांकि, कई कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल और राजनयिक परंपराओं के अनुरूप है, न कि किसी नई विदेश नीति का संकेत।

फिलहाल, इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाज़ी जारी है, लेकिन शशि थरूर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ऐसे संवेदनशील अवसरों को राजनीतिक विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक शिष्टाचार और दिवंगत नेता के प्रति सम्मान की भावना के रूप में देखा जाना चाहिए।

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