आगरा/रायपुर। छत्तीसगढ़ी भाषा की समृद्ध शब्द-संपदा अब किताब के पन्नों पर स्थायी रूप से दर्ज होने जा रही है। केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की ओर से छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला विस्तृत त्रिभाषी कोश तैयार किया जा रहा है। इस महत्वपूर्ण कार्य को संस्थान के अनुसंधान एवं भाषा-विकास विभाग की ‘हिंदी लोक शब्दकोश परियोजना’ के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है।
इस त्रिभाषी कोश में छत्तीसगढ़ी के रोजमर्रा के बोलचाल वाले शब्दों के साथ-साथ लोकजीवन, खेती-किसानी, प्रकृति, खान-पान, सामाजिक संबंधों, रीति-रिवाजों और परंपराओं से जुड़े शब्दों को भी शामिल किया जाएगा। छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रचलित ऐसे अनेक शब्द हैं, जिनमें प्रदेश की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान स्पष्ट दिखाई देती है। इनमें से कई शब्द पीढ़ियों से लोकपरंपरा और बोलचाल के माध्यम से आगे बढ़ते आए हैं।
छत्तीसगढ़ी-हिंदी-अंग्रेजी में दर्ज होंगे शब्द
छत्तीसगढ़ी कोश के निर्माण के लिए 24 से 28 अगस्त 2026 तक केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में विशेष शब्द-संकलन कार्य आयोजित किया गया। इसमें छत्तीसगढ़ी भाषा और भाषाविज्ञान के विशेषज्ञों ने भाग लिया।
अनुसंधान एवं भाषा-विकास विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी के अनुसार, कोश में छत्तीसगढ़ी शब्दों के हिंदी और अंग्रेजी अर्थ के साथ उनके वाक्यगत प्रयोग को भी महत्व दिया जा रहा है। इससे यह कोश केवल शब्दों का संग्रह नहीं रहेगा, बल्कि भाषा के अध्ययन और शोध के लिए एक उपयोगी संदर्भ सामग्री के रूप में भी काम करेगा।
भाषा के साथ संस्कृति के संरक्षण की पहल
केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक प्रो. हरि शंकर ने कहा कि लोकभाषाओं के शब्दों में किसी क्षेत्र का जीवन और उसकी सांस्कृतिक पहचान छिपी होती है। ऐसे शब्दों को सुरक्षित रखना केवल भाषा संरक्षण का काम नहीं, बल्कि उस समाज की सांस्कृतिक विरासत को बचाने का भी प्रयास है।
उन्होंने कहा कि ‘हिंदी लोक शब्दकोश परियोजना’ के माध्यम से विभिन्न लोकभाषाओं की शब्द-संपदा को व्यवस्थित रूप से संकलित कर आने वाली पीढ़ियों और शोधकर्ताओं के लिए सुरक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है।
विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए बनेगा महत्वपूर्ण स्रोत
छत्तीसगढ़ी त्रिभाषी कोश के प्रकाशन से भाषा के विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और अध्येताओं को एक महत्वपूर्ण संदर्भ-स्रोत उपलब्ध होगा। इसके जरिए छत्तीसगढ़ी भाषा के पारंपरिक शब्दों के अर्थ, प्रयोग और उनके सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों को समझने में मदद मिलेगी।
यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भारतीय भाषाओं और स्थानीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन पर दिए गए जोर के अनुरूप भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे छत्तीसगढ़ी भाषा की लोक शब्द-संपदा को व्यवस्थित रूप से दस्तावेजीकृत करने के साथ उसकी सांस्कृतिक स्मृतियों को भी लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।
विशेषज्ञों और संस्थान की टीम ने किया सहयोग
इस परियोजना में छत्तीसगढ़ी कोश के संपादक प्रो. सुधीर शर्मा के साथ डॉ. माणिक विश्वकर्मा, विजय मिश्र और आकाश भगत ने सहभागिता की। वहीं केंद्रीय हिंदी संस्थान की प्रो. सपना गुप्ता, डॉ. मीनाक्षी दूबे, डॉ. जोगेंद्र सिंह मीणा, डॉ. परमान सिंह, सुष्मिता बारिक और दीपेंद्र कुमार शर्मा सहित अन्य विशेषज्ञों ने भी विभिन्न स्तरों पर सहयोग प्रदान किया।
छत्तीसगढ़ी भाषा के इस विस्तृत त्रिभाषी कोश के तैयार होने से प्रदेश की लोकभाषा को एक महत्वपूर्ण दस्तावेजी पहचान मिलने की उम्मीद है। साथ ही यह छत्तीसगढ़ की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में भी अहम भूमिका निभा सकता है।


