Saturday, July 11, 2026

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भारत के हाथ से निकला मोंगला पोर्ट प्रोजेक्ट, चीन बनाएगा स्पेशल इकोनॉमिक जोन

बीजिंग/ढाका: भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाने वाले बांग्लादेश के मोंगला पोर्ट से जुड़ा बड़ा प्रोजेक्ट अब चीन के हाथों में चला गया है। बांग्लादेश सरकार ने मोंगला पोर्ट के पास प्रस्तावित स्पेशल इकोनॉमिक जोन (SEZ) के विकास के लिए चीनी सरकारी कंपनी चाइना सिविल इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन (CCECC) के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं।

यह समझौता प्रधानमंत्री तारिक रहमान की चीन यात्रा के दौरान बीजिंग में हुआ। खास बात यह है कि यही परियोजना पहले भारत को आवंटित की गई थी।

कैसे भारत के हाथ से निकला प्रोजेक्ट?

साल 2015 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुए समझौते के तहत मोंगला और मीरसराय में भारतीय इकोनॉमिक जोन विकसित किए जाने थे। भारत सरकार ने इस परियोजना के लिए फंडिंग की व्यवस्था की और 2018 में हिरानंदानी ग्रुप को डेवलपर नियुक्त किया। हालांकि, परियोजना तय समय पर शुरू नहीं हो सकी।

बांग्लादेश सरकार के अनुसार, कोविड-19 महामारी और अन्य कारणों से लंबे समय तक काम आगे नहीं बढ़ा। इसके बाद अक्टूबर 2025 में तत्कालीन अंतरिम सरकार ने भारतीय परियोजना को रद्द कर दिया।

चीन को मिला बड़ा मौका

भारत की परियोजना रद्द होने के बाद चीन ने इसी 110 एकड़ भूमि पर स्पेशल इकोनॉमिक जोन विकसित करने का प्रस्ताव दिया। अब इस समझौते के तहत मोंगला पोर्ट के पास भारी उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार निर्माण इकाइयाँ, वेयरहाउस और आधुनिक लॉजिस्टिक्स हब विकसित किए जाएंगे।

बांग्लादेश-चीन के बीच कई बड़े समझौते

मोंगला परियोजना के अलावा बांग्लादेश और चीन के बीच निवेश एवं औद्योगिक सहयोग से जुड़े कई अन्य समझौतों पर भी हस्ताक्षर हुए हैं। इनमें चट्टोग्राम के अनवारा क्षेत्र में चीनी औद्योगिक जोन का विकास तथा निवेश बढ़ाने के लिए विभिन्न संस्थाओं के बीच सहयोग शामिल है।

भारत के लिए क्यों अहम है मोंगला पोर्ट?

मोंगला पोर्ट बंगाल की खाड़ी में स्थित बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा समुद्री बंदरगाह है। इसे भारत की पूर्वोत्तर क्षेत्र से जुड़ी रणनीतिक और व्यापारिक योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। चीन की बढ़ती भागीदारी से क्षेत्र में उसकी आर्थिक मौजूदगी और प्रभाव मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है।

हालांकि, इस घटनाक्रम के दीर्घकालिक रणनीतिक और सुरक्षा प्रभावों को लेकर अलग-अलग विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है। भविष्य में इसका वास्तविक असर दोनों देशों की नीतियों और क्षेत्रीय भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

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