Sunday, July 26, 2026

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करणी सेना के प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह तोमर ने सिंधी समाज को दी चालीहा महोत्सव की शुभकामनाएं, 40 दिनों तक होगी भक्तिभाव से आराधना

रायपुर। सिंधी समाज के आस्था और परंपरा से जुड़े पवित्र चालीहा महोत्सव का शुभारंभ हो गया है। इस अवसर पर क्षत्रिय करणी सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष भाई वीरेन्द्र सिंह तोमर ने सिंधी समाज के सभी भाई-बहनों को चालीहा महोत्सव की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि 40 दिनों तक चलने वाली यह तपस्या, साधना और भक्तिभाव से की जाने वाली आराधना समाज में शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक सुकून का संदेश देती है।चालीहा महोत्सव का शुभारंभ 16 जुलाई, गुरुवार को हुआ। पर्व शुरू होते ही रायपुर सहित देश-विदेश में बसे सिंधी समाज के लोगों ने विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेना शुरू कर दिया है। श्रद्धालु पूरे नियम और श्रद्धा के साथ भगवान झूलेलाल एवं वरुण देव की आराधना कर रहे हैं।

व्यसन मुक्ति और प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है पर्व

वीरेन्द्र सिंह तोमर ने चालीहा महोत्सव के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि जीवन में अनुशासन, संयम और सकारात्मक बदलाव का संदेश भी देता है। उन्होंने कहा कि इस दौरान किए जाने वाले व्रत और नियम लोगों को बुरी आदतों एवं व्यसनों से दूर रहने की प्रेरणा देते हैं।उन्होंने कहा कि चालीहा महोत्सव नदियों और जल स्रोतों के संरक्षण का भी संदेश देता है। सिंधी समाज में भगवान वरुण देव की पूजा के माध्यम से जल और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत किया जाता है।

क्या है चालीहा महोत्सव की परंपरा?

चालीहा महोत्सव के दौरान श्रद्धालु कठिन नियमों का पालन करते हैं। मान्यता के अनुसार इस अवधि में कई भक्त:

बालों में कंघी नहीं करते।
दाढ़ी और बाल नहीं कटवाते।
जूते-चप्पल का त्याग करते हैं।
जमीन पर सोते हैं।
ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।

इसके अलावा कई श्रद्धालु महोत्सव के शुरुआती नौ दिन या अंतिम नौ दिनों में व्रत रखते हैं। व्रत के दौरान दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन या प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा भी है।

भगवान झूलेलाल की आराधना से जुड़ा है पर्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चालीहा महोत्सव का संबंध सिंधी समाज के आराध्य देव भगवान झूलेलाल और भगवान वरुण देव से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि करीब एक हजार वर्ष पहले सिंध क्षेत्र में मिरख बादशाह का शासन था, जो अत्याचारों के लिए जाना जाता था।कहा जाता है कि उसके अत्याचारों से परेशान लोगों ने सिंधु नदी के किनारे 40 दिनों तक भगवान वरुण देव की कठिन आराधना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान वरुण देव ने उन्हें संकट से मुक्ति का आश्वासन दिया।

मान्यता है कि वरुण देव ने भविष्यवाणी की थी कि वे रतन राय के घर जन्म लेकर समाज के दुखों का अंत करेंगे। इसके बाद सिंध प्रांत के नसरपुर नगर में वर्ष 991 में चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम उदयचंद रखा गया। आगे चलकर यही बालक भगवान झूलेलाल के रूप में प्रसिद्ध हुए और उन्होंने समाज को अत्याचारों से मुक्ति दिलाई।

आस्था और एकता का प्रतीक है चालीहा महोत्सव

चालीहा महोत्सव सिंधी समाज के लिए केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता को मजबूत करने का अवसर भी है। 40 दिनों तक चलने वाली यह साधना श्रद्धालुओं को संयम, सेवा और भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। रायपुर सहित पूरे प्रदेश में इस पर्व को लेकर सिंधी समाज में विशेष उत्साह और श्रद्धा का माहौल देखने को मिल रहा है।

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