प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) अत्याचार निवारण अधिनियम से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की जाति का नाम लेना मात्र SC/ST एक्ट के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यह भी साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल संबंधित व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने की मंशा से किया था।
जस्टिस संतोष राय की अदालत ने वेगराज सिंह और एक अन्य की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए बरेली की अदालत द्वारा 21 मार्च 2025 को जारी किया गया समन आदेश रद्द कर दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल ‘चमार’ शब्द का इस्तेमाल अपने आप में यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त नहीं है कि आरोपी का उद्देश्य व्यक्ति को उसकी जाति के कारण अपमानित करना था। मामले में कथित घटना की परिस्थितियों, बातचीत के संदर्भ और आरोपी की मंशा को भी देखा जाना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने माना कि SC/ST एक्ट के तहत अपराध के लिए केवल जाति का उल्लेख होना पर्याप्त नहीं, बल्कि यह भी सामने आना चाहिए कि कथित जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल जाति के आधार पर जानबूझकर अपमानित या अपमानित करने के उद्देश्य से किया गया था।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत के समन आदेश को निरस्त करते हुए वेगराज सिंह और सह-आरोपी को राहत दी। कोर्ट की यह टिप्पणी SC/ST एक्ट से जुड़े मामलों में आरोपों की परिस्थितियों और आरोपी की कथित मंशा के महत्व को रेखांकित करती है।


