रायपुर। छत्तीसगढ़ की सामाजिक और संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय वीरेंद्र सिंह तोमर को उनके समर्थक ‘छत्तीसगढ़ का शेर-ए-हिंद’ कहते हैं। इस पहचान के पीछे सबसे ज्यादा जिस घटना का उल्लेख किया जाता है, वह वर्ष 2018 का बिलासपुर विवाद है। इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाई प्रह्लाद मोदी के एक बयान को लेकर क्षत्रिय समाज के बीच नाराजगी की बात सामने आई थी।
2018 में आखिर क्या हुआ था?
प्रह्लाद मोदी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छोटे भाई हैं और ऑल इंडिया फेयर प्राइस शॉप डीलर्स फेडरेशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।
बात सन् 2018 की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाई प्रह्लाद मोदी छत्तीसगढ़ के बिलासपुर दौरे पर थे। एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने क्षत्रिय समाज पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी थी।
खबर आग की तरह फैल गई और पूरे क्षत्रिय समाज में भारी आक्रोश पैदा हो गया। उस समय कोई बड़ा नेता सामने आने को तैयार नहीं था, क्योंकि मामला देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के परिवार से जुड़ा था।
तब करणी सेना के छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर वीरेंद्र सिंह तोमर ने नेतृत्व संभाला। वीरेंद्र सिंह तोमर के नेतृत्व में सैंकड़ों करणी सैनिक ने बिलासपुर पहुँचकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाई प्रह्लाद मोदी से सार्वजनिक माफ़ी मंगवाई थी।
बताया जाता है कि तोमर अपने साथियों के साथ बिलासपुर पहुंचे और प्रह्लाद मोदी से समाज के सामने सार्वजनिक रूप से माफी की मांग की। अंततः प्रह्लाद मोदी को अपनी टिप्पणी पर क्षत्रिय समाज से सार्वजनिक माफी मांगनी पड़ी।
कैसे जुड़ा ‘शेर-ए-हिंद’ नाम?
समर्थकों का कहना है कि 2018 के इस विवाद के बाद वीरेंद्र सिंह तोमर के साहस और नेतृत्व की समाज के बीच चर्चा हुई। इसके बाद समर्थकों और करणी सेना से जुड़े लोगों ने उन्हें ‘शेर-ए-हिंद’ की उपाधि से संबोधित करना शुरू किया।
समर्थकों के अनुसार, प्रधानमंत्री के परिवार से जुड़े व्यक्ति के सामने भी समाज के सम्मान का मुद्दा उठाना उनके लिए निडरता और सामाजिक स्वाभिमान का प्रतीक था। इसी वजह से यह घटना आज भी उनके समर्थकों के बीच विशेष रूप से याद की जाती है।
क्या 2025 की कार्रवाई का 2018 से कोई संबंध था?
वीरेंद्र सिंह तोमर के समर्थकों और सोशल मीडिया पर किए गए कुछ दावों में 2025 की कार्रवाई को 2018 के प्रह्लाद मोदी विवाद से जोड़ने की कोशिश की गई। कुछ लोगों ने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई तक बताया।
करणी सेना से जुड़ी भूमिका भी चर्चा में
वीरेंद्र सिंह तोमर की करणी सेना से जुड़ी भूमिका को लेकर भी अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं। कुछ संगठनात्मक धड़े उन्हें छत्तीसगढ़ में महत्वपूर्ण पदों पर बताते हैं, जबकि दूसरे गुटों की ओर से उनके संगठनात्मक संबंधों पर सवाल उठाए गए हैं।
ऐसे में उनके पद और संगठनात्मक जिम्मेदारी का उल्लेख करते समय संबंधित करणी सेना गुट का नाम स्पष्ट करना जरूरी है।
धार्मिक आयोजनों में भी रही सक्रियता
वीरेंद्र सिंह तोमर का नाम रायपुर के महादेव घाट पर खारून नदी की महाआरती जैसे धार्मिक आयोजनों से भी जोड़ा जाता है। उनके समर्थकों के अनुसार, पूर्णिमा के अवसर पर होने वाली इन गतिविधियों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते रहे हैं।
समर्थकों का कहना है कि इन आयोजनों का उद्देश्य क्षेत्र की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करना है।
समर्थकों के बीच आज भी निडर नेता की छवि
वीरेंद्र सिंह तोमर की सार्वजनिक पहचान का सबसे चर्चित हिस्सा 2018 का प्रह्लाद मोदी विवाद है। समर्थक इसे उनके साहस, सामाजिक स्वाभिमान और नेतृत्व की मिसाल मानते हैं।
वहीं, 2025 में हुई गिरफ्तारी और उनके खिलाफ दर्ज मामलों ने उनके सार्वजनिक जीवन को एक अलग वजह से चर्चा में ला दिया। ऐसे में ‘छत्तीसगढ़ का शेर-ए-हिंद’ उनकी समर्थक-समुदाय में प्रचलित पहचान है, जबकि 2025 से जुड़े आरोपों का अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।


